उमंग-तरंग मन सतरंग 
बिखरे है अजीब से रंग
इनके सदा खेल निराले 
सुंदर मन बना चितरंग।

सरल तरल गरल खलल
मनभोर मनचोर करल
भोलापन लचीलापन 
नखरेदार ये जिद्दीपन।

कभी हँसी का फब्बारा
तो कभी रुआँसा बालापन
बोली लडखडाती तुतलाती
मन्द-मन्द ये जब मुस्कुराती।

ये गिरते पड़ते अडिग पल 
मानो ये यूँ ही थम जाती
जय हो तेरी विजय हो 
ये जीत भी अजय हो।

भानु सा तेज प्रबल सा
चन्द्र सा शीतल सरल सा
बस आस बन प्रकाश सा
दूर भगादे अंधकार जगत का।
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रचनाकार
श्याम कुमार कोलारे
छिंदवाड़ा, मध्यप्रदेश
मोबाइल 9893573770