स्कूल से नदारद बच्चे एवं उनकी शिक्षा पर सवालियां निशान !

स्कूल से नदारद बच्चे एवं उनकी शिक्षा पर सवालियां निशान !

 स्कूल से नदारद बच्चे एवं उनकी शिक्षा पर सवालियां निशान ! 

आज कक्षा में सूरज और उसके साथ बैठे पाँच-छह बच्चे अपनी मस्ती में मग्न हैं। कक्षा में शिक्षक क्या पढ़ा रहे हैंउससे उनका कोई सरोकार नहीं है। एक झोला में रही एकाध पुस्तक, घर में पहने जाने वाले साधारण कपडे और बिना तैयार हुए जैसे घर में थे वैसे ही सीधे स्कूल में आ गए l वे सभी यहाँ अपनी रुचि से नहीं आए हैंबल्कि बुलाए गए हैं। स्कूल से लंबे समय से गायब रहे सूरज और ऐसे ही छह बच्चों के घर शिक्षक ने कई चक्कर लगाएतब जाकर बच्चे कुछ दिनों से स्कूल आना शुरू करने के लिए तैयार हुए। इसके लिए शिक्षक को बहुत परिश्रम करना पड़ा। सूरजमीनाराहुलखुशबूअंजुम और मुस्कान कक्षा के छात्र हैं। उनके माता-पिता दिहाड़ी मजदूरी करते हैं। गाँव में रोज़ मजदूरी नहीं मिलतीइसलिए ये सभी कमाने के लिए दिल्ली या पास के बड़े शहरों में चले जाते हैं और साथ में उनके बच्चे भी होते हैं। गाँव में उनके बूढ़े माता-पिता ही रह जाते हैं। बच्चों को उनके सहारे छोड़कर जाना भी उनके लिए ठीक नहीं लगताऔर उनके संरक्षण में भी बच्चे स्कूल एवं अन्य सही कार्यों में ध्यान नहीं देते। यह कोई एक कहानी नहीं हैयह देश के कई स्कूलों और गाँवों में घट रही घटनाओं के जीवंत उदाहरण हैं।

अब रही बात स्कूल से उनके जुड़ाव की तो ये बच्चे कैसे पढ़ेंगे और कैसे सीखेंगेयह शिक्षक एवं समाज दोनों के लिए एक बहुत बड़ा सवाल है। जो बच्चे स्कूल ही नहीं आ रहेउन्हें शिक्षक सिखाएगा कैसेऔर जो बच्चे स्कूल तो आ रहे हैंपरंतु सीख नहीं पा रहे यह भी एक बहुत बड़ी चुनौती है। कक्षा तक बच्चों के सीखने के लिए सरकार की ओर से तमाम प्रयास किए जा रहे हैंजिनमें बुनियादी साक्षरता एवं संख्यात्मक ज्ञान को बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। 2027 तक देश के सभी बच्चों को कक्षा तक एफएलएन (FLN) में निपुण करना लक्ष्य है। इसके लिए ‘निपुण भारत’ कार्यक्रम के तहत गुणवत्तापूर्ण प्राथमिक शिक्षा का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इसके अंतर्गत कक्षा तक के सभी बच्चों को समझ के साथ पढ़नालिखना और बुनियादी गणित- जिसमें जोड़घटाव आदि की दक्षता शामिल है- में सक्षम बनाना है। इस प्रणाली का उद्देश्य सीखने की गुणवत्ता में सुधार लाना हैजिसमें रटने के बजाय समझ-आधारित शिक्षण को बढ़ावा देनागतिविधि-आधारित और बाल-केंद्रित शिक्षण पद्धति अपनाना तथा प्रारंभिक कक्षाओं में मजबूत नींव तैयार कर आगे की पढ़ाई को आसान बनाना शामिल है।

इन तमाम सरकारी प्रयासों के साथ-साथ देश की कई स्वयंसेवी संस्थाओं की भागीदारी भी शिक्षा सुधार के प्रयासों को दिशा प्रदान कर रही हैजिससे शिक्षा की गुणवत्ता पर ध्यान केंद्रित कर बच्चों के अधिगम को बेहतर किया जा सके। प्रथम एजुकेशन फाउंडेशनअजीम प्रेमजी फाउंडेशनटीच फॉर इंडियाएजुकेट गर्ल्सस्माइल फाउंडेशनरूम टू रीड इंडियाएकलव्यनांदी फाउंडेशनसेंट्रल स्क्वायर फाउंडेशनआवर चिल्ड्रन फाउंडेशनअक्षय पात्र फाउंडेशन जैसी संस्थाएँ भारत में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए विभिन्न स्तरों पर कार्य कर रही हैं। ये संस्थाएँ प्रारंभिक साक्षरता और बुनियादी गणित कौशल विकसित करनेशिक्षकों के प्रशिक्षण और शैक्षणिक नेतृत्व को सशक्त बनानेवंचित एवं कम संसाधन वाले स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षण उपलब्ध करानेबालिकाओं के नामांकन और सीखने के परिणाम सुधारनेपुस्तकालय एवं पठन कार्यक्रम संचालित करनेसामुदायिक शिक्षा केंद्र स्थापित करनेबाल साहित्य और रचनात्मक शिक्षण को बढ़ावा देने तथा मिड-डे मील के माध्यम से बच्चों के पोषणउपस्थिति और सीखने की क्षमता को मजबूत करने जैसे कार्यों के जरिए शिक्षा को अधिक समावेशीप्रभावी और परिणामोन्मुख बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। इतने व्यापक प्रयासोंनीतियोंयोजनाओं और स्वयंसेवी संस्थाओं की सक्रियता के बावजूद आज भी बड़ी संख्या में बच्चे शिक्षा से पूरी तरह नहीं जुड़ पा रहे हैं। देश में एक बहुत बड़ा तबका ऐसा भी है जो बुनियादी ज्ञान से दूर है। प्रथम संस्था द्वारा प्रकाशित शिक्षा आधारित रिपोर्ट- एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (ASER) 2024- के आँकड़े दिखाते हैं कि अभी भी बहुत बड़ा ‘लर्निंग गैप’ मौजूद है।

कक्षा 3 के केवल 27 प्रतिशत बच्चे ही कक्षा स्तर का पाठ पढ़ पाते हैंजबकि 33.7 प्रतिशत बच्चे ही साधारण घटाव कर पाते हैं। कक्षा के बच्चों की स्थिति भी लगभग ऐसी ही है- कक्षा के करीब आधे बच्चे ही कक्षा स्तर का पाठ (एक साधारण कहानी) पढ़ पाते हैंऔर केवल 30.7 प्रतिशत बच्चे ही सामान्य भाग कर पाते हैं।

यह स्थिति हमारे सामने एक गंभीर और जटिल चुनौती प्रस्तुत करती है। विशेष रूप से वे बच्चे जो नियमित रूप से स्कूल में अनुपस्थित रहते हैंया जिनके परिवार रोज़गार की तलाश में पलायन कर जाते हैंशिक्षा की मुख्यधारा से बाहर हो जाते हैं। ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों में आज भी आजीविका प्राथमिकता है और शिक्षा द्वितीय। जब परिवार मजदूरी के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाता हैतो बच्चों की पढ़ाई सबसे पहले प्रभावित होती है। कई बार नए स्थान पर स्कूल में प्रवेश नहीं हो पातादस्तावेज़ों की कमी होती हैया भाषा और पाठ्यक्रम का अंतर बच्चों को हतोत्साहित कर देता है। परिणामस्वरूप वे धीरे-धीरे स्कूल से दूर होते जाते हैं। इसी प्रकार कुछ बच्चे घरेलू कार्यखेतिहर मजदूरीछोटे-मोटे काम या पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण नियमित रूप से विद्यालय नहीं पहुँच पाते। लगातार अनुपस्थिति के कारण वे पढ़ाई में पीछे रह जाते हैंआत्मविश्वास कम हो जाता है और अंततः वे ड्रॉपआउट की श्रेणी में आ जाते हैं। यह केवल शिक्षा का प्रश्न नहींबल्कि सामाजिक-आर्थिक असमानतागरीबीअस्थिर रोजगार और कभी-कभी शिक्षा की गुणवत्ता से भी जुड़ा मुद्दा है। यदि स्कूल बच्चों के लिए आकर्षकलचीले और सहायक वातावरण नहीं बना पाएँतो कमजोर पृष्ठभूमि के बच्चे सबसे पहले छूट जाते हैं। जब तक हम इन ‘अनदेखे बच्चों’ तक नहीं पहुँचेंगेतब तक शिक्षा की गुणवत्ता और सार्वभौमिकता का लक्ष्य अधूरा रहेगा। शिक्षा का वास्तविक अर्थ तभी पूर्ण होगाजब हर बच्चा चाहे वह कहीं भी हो सीखने का अवसर पा सके।

लेखक

श्याम कुमार कोलारे


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