स्कूल से नदारद बच्चे एवं उनकी शिक्षा पर सवालियां निशान !
अब रही बात स्कूल से उनके जुड़ाव की तो ये बच्चे कैसे पढ़ेंगे और कैसे सीखेंगे? यह शिक्षक एवं समाज दोनों के लिए एक बहुत बड़ा सवाल है। जो बच्चे स्कूल ही नहीं आ रहे, उन्हें शिक्षक सिखाएगा कैसे? और जो बच्चे स्कूल तो आ रहे हैं, परंतु सीख नहीं पा रहे यह भी एक बहुत बड़ी चुनौती है। कक्षा 3 तक बच्चों के सीखने के लिए सरकार की ओर से तमाम प्रयास किए जा रहे हैं, जिनमें बुनियादी साक्षरता एवं संख्यात्मक ज्ञान को बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। 2027 तक देश के सभी बच्चों को कक्षा 3 तक एफएलएन (FLN) में निपुण करना लक्ष्य है। इसके लिए ‘निपुण भारत’ कार्यक्रम के तहत गुणवत्तापूर्ण प्राथमिक शिक्षा का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इसके अंतर्गत कक्षा 3 तक के सभी बच्चों को समझ के साथ पढ़ना, लिखना और बुनियादी गणित- जिसमें जोड़, घटाव आदि की दक्षता शामिल है- में सक्षम बनाना है। इस प्रणाली का उद्देश्य सीखने की गुणवत्ता में सुधार लाना है, जिसमें रटने के बजाय समझ-आधारित शिक्षण को बढ़ावा देना, गतिविधि-आधारित और बाल-केंद्रित शिक्षण पद्धति अपनाना तथा प्रारंभिक कक्षाओं में मजबूत नींव तैयार कर आगे की पढ़ाई को आसान बनाना शामिल है।
इन तमाम सरकारी प्रयासों के साथ-साथ देश की कई स्वयंसेवी संस्थाओं की भागीदारी भी शिक्षा सुधार के प्रयासों को दिशा प्रदान कर रही है, जिससे शिक्षा की गुणवत्ता पर ध्यान केंद्रित कर बच्चों के अधिगम को बेहतर किया जा सके। प्रथम एजुकेशन फाउंडेशन, अजीम प्रेमजी फाउंडेशन, टीच फॉर इंडिया, एजुकेट गर्ल्स, स्माइल फाउंडेशन, रूम टू रीड इंडिया, एकलव्य, नांदी फाउंडेशन, सेंट्रल स्क्वायर फाउंडेशन, आवर चिल्ड्रन फाउंडेशन, अक्षय पात्र फाउंडेशन जैसी संस्थाएँ भारत में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए विभिन्न स्तरों पर कार्य कर रही हैं। ये संस्थाएँ प्रारंभिक साक्षरता और बुनियादी गणित कौशल विकसित करने, शिक्षकों के प्रशिक्षण और शैक्षणिक नेतृत्व को सशक्त बनाने, वंचित एवं कम संसाधन वाले स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षण उपलब्ध कराने, बालिकाओं के नामांकन और सीखने के परिणाम सुधारने, पुस्तकालय एवं पठन कार्यक्रम संचालित करने, सामुदायिक शिक्षा केंद्र स्थापित करने, बाल साहित्य और रचनात्मक शिक्षण को बढ़ावा देने तथा मिड-डे मील के माध्यम से बच्चों के पोषण, उपस्थिति और सीखने की क्षमता को मजबूत करने जैसे कार्यों के जरिए शिक्षा को अधिक समावेशी, प्रभावी और परिणामोन्मुख बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। इतने व्यापक प्रयासों, नीतियों, योजनाओं और स्वयंसेवी संस्थाओं की सक्रियता के बावजूद आज भी बड़ी संख्या में बच्चे शिक्षा से पूरी तरह नहीं जुड़ पा रहे हैं। देश में एक बहुत बड़ा तबका ऐसा भी है जो बुनियादी ज्ञान से दूर है। प्रथम संस्था द्वारा प्रकाशित शिक्षा आधारित रिपोर्ट- एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (ASER) 2024- के आँकड़े दिखाते हैं कि अभी भी बहुत बड़ा ‘लर्निंग गैप’ मौजूद है।
कक्षा 3 के केवल 27 प्रतिशत बच्चे ही कक्षा 2 स्तर का पाठ पढ़ पाते हैं, जबकि 33.7 प्रतिशत बच्चे ही साधारण घटाव कर पाते हैं। कक्षा 5 के बच्चों की स्थिति भी लगभग ऐसी ही है- कक्षा 5 के करीब आधे बच्चे ही कक्षा 2 स्तर का पाठ (एक साधारण कहानी) पढ़ पाते हैं, और केवल 30.7 प्रतिशत बच्चे ही सामान्य भाग कर पाते हैं।
यह स्थिति हमारे सामने एक गंभीर और जटिल चुनौती प्रस्तुत करती है। विशेष रूप से वे बच्चे जो नियमित रूप से स्कूल में अनुपस्थित रहते हैं, या जिनके परिवार रोज़गार की तलाश में पलायन कर जाते हैं, शिक्षा की मुख्यधारा से बाहर हो जाते हैं। ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों में आज भी आजीविका प्राथमिकता है और शिक्षा द्वितीय। जब परिवार मजदूरी के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाता है, तो बच्चों की पढ़ाई सबसे पहले प्रभावित होती है। कई बार नए स्थान पर स्कूल में प्रवेश नहीं हो पाता, दस्तावेज़ों की कमी होती है, या भाषा और पाठ्यक्रम का अंतर बच्चों को हतोत्साहित कर देता है। परिणामस्वरूप वे धीरे-धीरे स्कूल से दूर होते जाते हैं। इसी प्रकार कुछ बच्चे घरेलू कार्य, खेतिहर मजदूरी, छोटे-मोटे काम या पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण नियमित रूप से विद्यालय नहीं पहुँच पाते। लगातार अनुपस्थिति के कारण वे पढ़ाई में पीछे रह जाते हैं, आत्मविश्वास कम हो जाता है और अंततः वे ड्रॉपआउट की श्रेणी में आ जाते हैं। यह केवल शिक्षा का प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक असमानता, गरीबी, अस्थिर रोजगार और कभी-कभी शिक्षा की गुणवत्ता से भी जुड़ा मुद्दा है। यदि स्कूल बच्चों के लिए आकर्षक, लचीले और सहायक वातावरण नहीं बना पाएँ, तो कमजोर पृष्ठभूमि के बच्चे सबसे पहले छूट जाते हैं। जब तक हम इन ‘अनदेखे बच्चों’ तक नहीं पहुँचेंगे, तब तक शिक्षा की गुणवत्ता और सार्वभौमिकता का लक्ष्य अधूरा रहेगा। शिक्षा का वास्तविक अर्थ तभी पूर्ण होगा, जब हर बच्चा चाहे वह कहीं भी हो सीखने का अवसर पा सके।
लेखक
श्याम कुमार कोलारे



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