जिंदगी

 *जिंदगी*


कैसे चुकाऊंगा कर्ज जिंदगी
समस्याओं से घिरा हुआ हूँ
महंगाई सिर चढ़कर नाचे
आभावों से घिरा हुआ हूँ।

मेहनत में न कोई कमी है
फिर भी मिलते दाम कम है
इस मुस्कुराते चेहरे के पीछे
छिपा ढेर सारा गम है।

जिम्मेदारी की बांध पगड़ी
कदम बडे भारी लगते है
स्वप्न में भी परवाह रहती है
रोज भूख की आग लगती है।

रोज थकान के बिस्तार पर
आराम के लिए सोता हूँ
नींद में भी जिंदगी तेरा कर्ज
मुझे बहुत सताता है।

पता नही ये अनजान रास्तों में
कब तक भटकता जाऊँगा
मंजिल का पता नही
और कितना आगे जाऊँगा।

रचनाकार
श्याम कुमार कोलारे
छिंदवाड़ा (म.प्र.) 
मो. 9893573770

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