नम्बरों और रिपोर्ट कार्ड के आकड़ों में उलझा अभिभावक, बच्चों की क्षमताओं एवं कौशलों का आंकलन करने का बदलता नजरिया
लेखक : श्याम कुमार कोलारे
सरकारी स्कूल के एक कक्षा में करीब 40 बच्चे जमीन पर दरी में बैठे
अपने गुरूजी से पाठ पढ़ रहे है । गुरुजी बारी-बारी बच्चों से बीच-बीच में पाठ
आधारित सवाल पूछ रहे थे । बच्चे बड़ी उत्साह से गुरूजी के सवाल का जबाब दे रहे थे ।
अंतिम छोर पर बैठा दीपू अपनी बारी का इन्तजार में गुरूजी की ओर ध्यान लगाये बहुत
देर से देख रहा था । दीपू सोच रहा था कि मेरे नम्बर आने पर मैं भी औरो की तरह सही
जवाब दुँगा । आज दीपू की तरफ गुरूजी का ध्यान ही नहीं गया; और स्कूल की छुट्टी का
समय हो गया । सभी बच्चे बस्ता बंद कर घर की ओर चलते बने । दीपू आज भी निराश मन से
घर की और लौटता है । ऐसे रोज कई दीपू
शिक्षको की उपेक्षा का शिकार होकर निराश लौटते होंगे । शिक्षक का बच्चों की ओर
ध्यान न होना एवं हर बच्चों से जुडाव न होने के कारण बच्चों के सीखने के अव्षर में
गिरावट देखि जा सकती है । शिक्षक का सभी बच्चों में ध्यान के आभाव में बच्चों में
नीरसता एवं उचित कक्षा में जुडाव न होना एक यह भी मुख्य कारण होता है । ऐसे बच्चों
स्कूल में शारीरिक रूप में तो मौजूद रहते है परन्तु मानसिक रूप से स्कूल से नहीं
जुड़ पाते है ।
ये सरकारी स्कूल या कहें तो सभी स्कूल जहाँ बच्चों की दर्ज संख्या
अधिक होती है उन कक्षाओं की रोज की कहानी हो सकती है । बड़ी कक्षाओं में हर एक
बच्चा पर ध्यान केन्द्रित करना शिक्षक के लिए थोडा मुश्किल हो जाता है । गुरूजी एक
बार पढ़ाने के बाद यह मान लेते है की सभी बच्चों को पाठ समझ में आ गया । इनमे से
सभी बच्चों की सीखने की क्षमता भिन्न-भिन्न होती है, कोई जल्दी सीखता है कोई देरी से
। कोई बार-बार समझाने पर भी नहीं समझ पाता है । परन्तु ऐसा नहीं है कि वह सीखेगा
ही नहीं ! कुछ बच्चे पढ़ाए गए पाठ को अपने हिसाब से दिमाग में विश्लेषण करते है एवं
उस सीख को अपनी बुद्धि के अनुसार आसपास से परिवेश से जोड़कर समझने की कोशिश करते है
तो कोई किसी पाठ को रट लेते है ।
साल के अंत में बच्चों की पढ़ाई और उसकी समझ को हम परीक्षा परिणाम
के आधार फैसला करते है है कि अमुख बच्चा अव्वल है या फेल । क्या साल भर की पढ़ाई
एवं उसकी सीख को चंद सवालों आधार पर उसका भविष्य का फैसला कर देते है । अव्वल रहने
वाले विद्यार्थियों के अलावा एक दिन की परीक्षा के लिए बना प्रश्न-पत्र ही यदि
अच्छा प्रदर्शन करने का मापदण्ड है तो खराब प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थियों की
जिम्मेदारी किसकी है? पूरे साल भर की पढ़ाई का सार केवल परीक्षा परिणाम
देने वाला रिपोर्टकार्ड क्यों है? पूरी शिक्षा प्राप्त
करते-करते ये जो विद्यार्थी अव्वलता का आवरण ओड़े रहते हैं, क्या
वे जीवन की परीक्षा में सहयोग, समानता, सामाजिकता, नैतिकता, सामुदायिकता,
सहभागिता, परिवार-पास-पड़ोस के प्रति
संवेदनशीलता की परीक्षा में भी अव्वल रहते हैं?
वे अभिभावक जिनकी चिन्ता पूरे साल भर अपने
बच्चों को अंकों की दौड़ में सबसे आगे दौड़ाने की रहती है। जो एक ऐसी चिन्ता में
घुले रहते हैं, जिसका कोई अंत नहीं। जो अपने बच्चों को हर रोज यह
सबक घुट्टी की तरह पिलाते रहते हैं, जिन्हें अपनी हिदायतें
एक टॉनिक या एक जरूरी कड़वी दवा की तरह लगती हैं। जिन्हें लगता है कि अक्सर सख्ती
से पेश आने का उनका नजरिया चाहे उसमें चेतावनी-धमकी भी शामिल हो, बच्चे के विकास के लिए जरूरी है। जो ए ग्रेड से नीचे समझौता नहीं करना
चाहते। क्या वह कभी इस ओर भी ध्यान देते होंगे कि उनके अपने रिपोर्ट कार्ड जीवन के
थपेड़ों से सामना करने के लिए कितना उपयोगी रहे हैं?
क्या साल भर पाँच-छह विषयों में ही विद्यार्थी
पारंगत हुए? क्या इससे इतर विद्यालय में विद्यार्थियों ने कुछ
नहीं समझा-जाना और माना? रटना सीखना नहीं होता। रटकर पढ़े या
उतारे गए सवालों की उलटी उत्तरपुस्तिका में कर देना और नब्बे फीसद अंक लाना वाकई
सही मूल्यांकन है? क्या यह पाँच-छह विषय विद्यार्थियों के
जीवन का आधार है? क्या इनमें अव्वल रहने से यही विद्यार्थी
एक अच्छे नागरिक बनेंगे। एक अच्छा इंसान बनेंगे? जो कमतर रहे
वे यह सब नहीं बन सकेंगे? अभिभावकों से पूछना चाहता हूँ कि
साल में परीक्षा परिणाम के दिन बच्चों के अंकों का कार्ड देखकर जो अपार खुशी आपको
होती है, इससे बढ़कर हजारों खुशियाँ आपको आपका बच्चा हर रोज
दे सकता है। देता है। बस ध्यान देना होगा। क्या आप कभी इस बात पर खुश हुए कि आज
उसने अपना टिफिन शेयर किया? क्या आप इस बात पर खुश हुए कि
उसे घर आते या स्कूल जाते समय देर इसलिए हुई क्योंकि वह घटित किसी घटना का सहयोगी
बना और उसने वहाँ हाथ बँटाना जरूरी समझा? क्या आप इस बात पर
कभी खुश हुए कि आपका बच्चा सामुदायिक कामों में समय देता है?
हमारे समाज के एक चलन आप सभी ने देखा होगा कि पुरस्कार
और सम्मान देने वाली संस्थाएँ अव्वल आने वाले बच्चों को मैडल और ट्राफी देंगी, स्कॉलरशिप
देंगी। क्या उन बच्चों के बारे में भी कुछ संस्थाएँ हैं जो रह गए इस अव्वलता की
दौड़ में पीछे रह गये है या कथित अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाए? उनके लिए भी स्कॉलरशिप हैं, जिन बच्चों को रोज की
पढ़ाई तक नसीब नहीं?
शिक्षा वह है जो हमें मनुष्यता की ओर ले जाए।
परीक्षा वह है जो हमें आभास कराये कि तुम यहाँ हो, तुम्हें
वहाँ होना चाहिए था। यह भी कि तुम यह जान चुके हो और तुम्हें अभी यह जानना बाकी
है। क्या यह परीक्षा परिणाम हमें यह अहसास कराते हैं? क्या
हमारी परीक्षाएँ बच्चों को खुद से करके सीखने का अवसर देती हैं। परन्तु हम एक
उत्तर वाले हल से आगे नहीं बढ़ पाए हैं।
हर साल खासकर बोर्ड परीक्षा के परिणाम आने
के एक दिन बाद टी.वी.चैनल रोते-बिलखते परिजनों को दिखाते हैं, जिनके बच्चे फेल होने के चलते अपनी अनमोल जिन्दगी को
अलविदा कह देते हैं। अखबारों के मुखपृष्ठों पर ऐसी कई खबरें पढ़ने को मिलती हैं
जिसमें परीक्षा के परिणामों से खिन्न विद्यार्थी आत्महत्या
कर लेते हैं। समाज की संवेदनाएं बस अफसोस जताने से आगे नहीं बढ़ पातीं। परीक्षा के
परिणामों के आते ही अंकों की अन्तहीन दौड़ में शामिल विद्यार्थी क्या, अभिभावक क्या शिक्षक भी सीना फुलाते नजर आते हैं। मैं सबसे पहले इस
व्यवस्था को बदस्तूर जारी रखने वाले नीति-नियंताओं से, इस
कुव्यवस्था में बच्चों के साथ खुद को झोंकने वाले अभिभावकों को और इस बेशरम पौधे
की तरह बढ़ने वाली कुपरिपाटी को खाद-पानी देने वालो को कहना चाहूंगा कि इस परिपाटी
को बंद करें । बच्चों को अपने सीखने के अधिक से अधिक अवशर दिए जाये, कोई जरुरी
नहीं कि आपका बच्चा पढ़ाई में अव्वल है; तो सभी क्षेत्रों में अव्वल होगा या जो
बच्चे पढ़ाई में अपनी रूचि नहीं दिखा पाते वे जीवन की दौड़ में पीछे रह जाते है,
समाज में ऐसे कई उदाहरण देखने को मिल जायेंगे जो पढ़ाई में पीछे थे; वो आज एक सफल
जीवन एवं समाज में एक मुकम्मल अस्तित्व बनाने में सफल रहे है ।
(यह लेखक के व्यक्तिगत विचार है ।)
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