परीक्षा का बढ़ता तनाव: इसका निदान हेतु परिवार और स्कूल की साझा जिम्मेदारी की आवश्यकता

परीक्षा का बढ़ता तनाव: इसका निदान हेतु परिवार और स्कूल की साझा जिम्मेदारी की आवश्यकता


“अंकों की होड़ से परे, विश्वास, संवाद और संतुलित वातावरण ही बच्चों को भयमुक्त परीक्षा की ओर ले जा सकते हैं।”

जैसे ही स्कूल का सत्र अपने अंतिम चरण में पहुँचता है, बच्चों के जीवन में एक नया माहौल बनने लगता है। कक्षाओं में पढ़ाई तेज हो जाती है, घर में भी पढ़ाई की चर्चा बढ़ जाती है और हर तरफ एक ही शब्द सुनाई देता है—परीक्षा। परीक्षा का समय आते ही कई बच्चों के मन में घबराहट, बेचैनी और डर पैदा हो जाता है। उन्हें लगता है कि यह केवल एक साधारण परीक्षा नहीं, बल्कि उनके पूरे साल की मेहनत का फैसला है। तीन घंटे का प्रश्नपत्र मानो उनकी योग्यता का प्रमाण बन जाता है। यही सोच धीरे-धीरे उनके मन पर दबाव डालने लगती है। दरअसल, हम अक्सर परीक्षा को बहुत बड़ा बना देते हैं। बच्चों को यह महसूस होने लगता है कि अच्छे अंक आए तो वे होशियार हैं और कम अंक आए तो वे कमजोर माने जाएंगे। जबकि सच्चाई इससे अलग है। अंक केवल यह बताते हैं कि बच्चा उस समय कितना याद कर पाया या समझ पाया। वे यह तय नहीं करते कि बच्चा कितना प्रतिभाशाली, रचनात्मक या समझदार है। हर बच्चे की अपनी अलग क्षमता होती है। कोई गणित में अच्छा होता है, तो कोई चित्रकला में। कोई जल्दी याद करता है, तो कोई धीरे-धीरे गहराई से समझता है। इसलिए केवल अंकों के आधार पर किसी की पूरी पहचान तय नहीं की जा सकती। परीक्षा का डर कई बार घर के वातावरण से भी बढ़ता है। माता-पिता अपने बच्चों के भविष्य को लेकर चिंतित रहते हैं। वे चाहते हैं कि उनका बच्चा अच्छा करे, आगे बढ़े और सम्मान पाए। यह भावना स्वाभाविक है, लेकिन जब यह चिंता दबाव में बदल जाती है, तो बच्चे डरने लगते हैं। बार-बार पढ़ाई के लिए टोकना, दूसरे बच्चों से तुलना करना या यह कहना कि “अगर अच्छे अंक नहीं आए तो क्या होगा?”—ऐसी बातें बच्चों के मन में असफलता का डर भर देती हैं। वे सोचने लगते हैं कि यदि वे उम्मीद के अनुसार प्रदर्शन नहीं कर पाए, तो परिवार निराश हो जाएगा। इस तरह परीक्षा सीखने का अवसर न रहकर बोझ बन जाती है।

परीक्षा के डर का एक बड़ा कारण अनियमित पढ़ाई भी है। कई बच्चे पूरे वर्ष नियमित रूप से पढ़ाई नहीं करते और परीक्षा के कुछ दिन पहले ही सब कुछ याद करने की कोशिश करते हैं। जब सिलेबस ज्यादा होता है और समय कम, तो स्वाभाविक रूप से तनाव बढ़ता है। इसलिए सबसे जरूरी बात यह है कि पढ़ाई को रोज़ की आदत बनाया जाए। प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा पढ़ने से विषय अच्छे से समझ में आते हैं। जब समझ मजबूत होती है, तो याद रखने में भी आसानी होती है और आत्मविश्वास बना रहता है। परीक्षा के दिनों में सबसे महत्वपूर्ण काम है- पुनरावृत्ति। जो कुछ पहले पढ़ा जा चुका है, उसे शांत मन से दोहराना चाहिए। अपनी बनाई हुई कॉपियों और नोट्स को देखना, मुख्य बिंदुओं को समझना और कठिन प्रश्नों का अभ्यास करना फायदेमंद होता है। इस समय बिल्कुल नई चीजें शुरू करने के बजाय पहले से पढ़ी गई सामग्री को मजबूत करना बेहतर होता है। साथ ही, पर्याप्त नींद लेना बहुत जरूरी है। कई बच्चे रात भर जागकर पढ़ाई करते हैं, जिससे उनका मन और शरीर थक जाता है। थका हुआ दिमाग ठीक से सोच नहीं पाता। इसलिए संतुलित दिनचर्या, अच्छा भोजन और थोड़ा आराम भी परीक्षा की तैयारी का हिस्सा होना चाहिए।

इस समय अभिभावकों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है। बच्चों को डांटने या डराने के बजाय उन्हें समझाना और उनका हौसला बढ़ाना ज्यादा जरूरी है। यदि बच्चा मेहनत कर रहा है, तो उसकी प्रशंसा करनी चाहिए। उसे यह भरोसा दिलाना चाहिए कि परिणाम चाहे जो भी हो, परिवार का प्यार और समर्थन उसके साथ रहेगा। जब बच्चे को यह विश्वास मिलता है कि उसके प्रयास की कद्र हो रही है, तो उसका आत्मबल बढ़ता है और वह ज्यादा आत्मविश्वास के साथ परीक्षा देता है। हमें यह भी समझना होगा कि परीक्षा जीवन का एक छोटा-सा हिस्सा है। जीवन में आगे बढ़ने के कई रास्ते होते हैं। कम अंक आना असफलता नहीं, बल्कि यह संकेत है कि हमें कहाँ सुधार की जरूरत है। असफलता भी हमें सिखाती है, हमें मजबूत बनाती है और आगे बेहतर करने की प्रेरणा देती है। कई सफल लोगों के जीवन में भी ऐसे मौके आए जब वे पहली बार में सफल नहीं हुए, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

सच्ची सफलता केवल अंकों में नहीं, बल्कि निरंतर प्रयास, सकारात्मक सोच और आत्मविश्वास में छिपी होती है। यदि बच्चा ईमानदारी से मेहनत करता है, सीखने की कोशिश करता है और अपनी गलतियों से सीखता है, तो वह जीवन में जरूर आगे बढ़ता है। परीक्षा को डर के रूप में नहीं, बल्कि अपने ज्ञान को परखने के अवसर के रूप में देखना चाहिए। जब हम अंक से अधिक प्रयास को महत्व देंगे, जब तुलना की जगह प्रोत्साहन देंगे और जब डर की जगह विश्वास को बढ़ावा देंगे, तब परीक्षा का माहौल भी बदल जाएगा। बच्चे मुस्कान के साथ परीक्षा देने जाएंगे और परिणाम को सहजता से स्वीकार करेंगे। परीक्षा कोई अंतिम निर्णय नहीं है। यह केवल एक पड़ाव है, एक अनुभव है। विश्वास, नियमित अभ्यास और परिवार के सहयोग से हर परीक्षा सरल बन सकती है। जब मन में संतुलन और आत्मविश्वास होगा, तब परीक्षा डर नहीं, बल्कि आगे बढ़ने की सीढ़ी बन जाएगी।

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