शिक्षा का समाधान हेतु परिवेश, परिवार और विद्यालय की साझा जिम्मेदारी की आवश्यकता

 शिक्षा का समाधान हेतु परिवेश, परिवार और विद्यालय की साझा जिम्मेदारी की आवश्यकता


शिक्षा, सीखने का मनोविज्ञान और बाल्यावस्था : एक समग्र दृष्टि

शिक्षा एक अनवरत चलने वाली प्रक्रिया है, जिसमें मनुष्य का ज्ञान भंडार निरंतर बढ़ता रहता है। सीखना किसी एक उम्र, कक्षा या विद्यालय की चारदीवारी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जन्म से प्रारंभ होकर जीवन भर चलता रहता है। मनुष्य जन्म से ही अपने आसपास के वातावरण को देखकर, सुनकर और अनुभव करके सीखना शुरू कर देता है। अनेक अध्ययनों से यह संकेत मिलता है कि सीखने की प्रक्रिया गर्भावस्था से ही प्रारंभ हो जाती है। जन्म के बाद परिवार, परिवेश और समाज इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हैं। सीखने का विज्ञान वास्तव में बहुत स्वाभाविक है। प्रकृति ने प्रत्येक जीव को इस प्रकार बनाया है कि वह अपने वातावरण से स्वयं सीख सके। जिस परिवेश में व्यक्ति रहता है, वहाँ की भाषा, व्यवहार, कार्यशैली और सामाजिक नियमों को वह धीरे-धीरे आत्मसात कर लेता है। उसे हर कौशल के लिए किसी औपचारिक गुरु की आवश्यकता नहीं होती। उदाहरण के लिए, एक किसान का बच्चा खेती के कार्यों को देखकर ही बहुत कुछ सीख जाता है। उसे खेत जोतना, बीज बोना या फसल काटना सिखाने के लिए अलग से प्रशिक्षण केंद्र नहीं भेजा जाता। इसी प्रकार कुम्हार का बच्चा घर में मिट्टी के बर्तन बनते हुए देखकर स्वयं उस कला की समझ विकसित करने लगता है। यह सीखना अनुभव आधारित और वातावरण से जुड़ा होता है। ठीक इसी प्रकार, जब बच्चा छोटे बचपन में जिस माहौल में रहता है, उसी के अनुसार उसका मानसिक और भावनात्मक विकास होता है। वह जो देखता है, सुनता है और महसूस करता है, वही उसकी प्रारंभिक समझ की नींव बनता है। यही कारण है कि बचपन की सीख जीवन भर व्यक्ति के व्यक्तित्व में दिखाई देती है। कहा जाता है कि छह वर्ष की आयु तक बच्चे का मानसिक विकास लगभग 80 प्रतिशत तक हो जाता है। आठ वर्ष की आयु तक वह अनेक बुनियादी कौशलों और समझ को विकसित कर लेता है। इसलिए यह उम्र बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

तीन से छह वर्ष की आयु वह अवस्था है, जब बच्चा अपनी प्रारंभिक समझ का निर्माण करता है। वर्तमान समय में यह जिम्मेदारी आंगनवाड़ी जैसी संस्थाओं के माध्यम से निभाई जा रही है। आंगनवाड़ी बच्चों को औपचारिक शिक्षा से पहले सीखने के लिए तैयार करती है। यहाँ खेल-आधारित गतिविधियों, गीतों, कहानियों और संवाद के माध्यम से बच्चे भाषा, संख्यात्मक ज्ञान और सामाजिक व्यवहार सीखते हैं। इस अवस्था में पढ़ाई का बोझ नहीं, बल्कि खेल-खेल में सीखना अधिक प्रभावी होता है। बच्चा अपने आसपास घटित हो रही गतिविधियों से सीखता है और धीरे-धीरे विद्यालय के लिए तैयार होता है। इसलिए आंगनवाड़ी को शिक्षा की पहली सीढ़ी कहा जा सकता है। प्राथमिक शिक्षा में प्रवेश करने के बाद बच्चे के सर्वांगीण विकास की प्रक्रिया और विस्तृत हो जाती है। 

यहाँ भाषा ज्ञान, संख्यात्मक ज्ञान, गणितीय समझ, सामाजिक एवं भावनात्मक विकास, संज्ञानात्मक विकास, शारीरिक विकास, सौंदर्य बोध और बौद्धिक विकास को व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ाया जाता है। यदि प्रारंभिक वर्षों में बच्चे को सकारात्मक वातावरण और आधारभूत साक्षरता तथा संख्यात्मक ज्ञान मिल जाता है, तो यह कौशल उसके पूरे जीवन में आत्मविश्वास और व्यक्तित्व निर्माण का आधार बनता है। बच्चों के सीखने का मनोविज्ञान बताता है कि वे सबसे अधिक अपने आसपास के वातावरण और अपने साथियों से सीखते हैं। यदि घर में संवाद का वातावरण हो, माता-पिता बच्चों की जिज्ञासाओं का सम्मान करें और उन्हें प्रश्न पूछने के लिए प्रोत्साहित करें, तो उनकी समझ गहरी होती है। इसी प्रकार विद्यालय में यदि शिक्षक बच्चों को भयमुक्त और सहयोगात्मक वातावरण दें, तो वे अधिक सक्रिय रूप से सीखते हैं। सीखना तब प्रभावी होता है, जब बच्चा स्वयं उसमें रुचि लेता है और उसे अनुभव करने का अवसर मिलता है। बचपन वह अवस्था है, जब जिज्ञासा अपने चरम पर होती है। बच्चा हर वस्तु के बारे में जानना चाहता है—यह क्या है, क्यों है और कैसे काम करती है। यदि उसकी जिज्ञासा का समाधान सकारात्मक और धैर्यपूर्वक किया जाए, तो उसकी समझ और भी विकसित होती है। लेकिन यदि उसे डांट या उपेक्षा मिलती है, तो वह प्रश्न पूछने से हिचकने लगता है। इसलिए परिवार, समुदाय और स्कूल की संयुक्त जिम्मेदारी है कि वे बच्चों को ऐसा वातावरण दें जहाँ वे स्वतंत्र रूप से सोच सकें, प्रश्न कर सकें और अपनी कल्पनाओं को व्यक्त कर सकें।

सरकार द्वारा स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में अनेक कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, जिनका उद्देश्य बच्चों के कौशल विकास को बढ़ावा देना है। आधारभूत साक्षरता और संख्यात्मक ज्ञान पर विशेष बल दिया जा रहा है ताकि कोई भी बच्चा प्रारंभिक स्तर पर पीछे न छूटे। लेकिन किसी भी योजना की सफलता तभी संभव है, जब उसका क्रियान्वयन बच्चों के मनोविज्ञान को ध्यान में रखकर किया जाए। केवल पाठ्यक्रम पूरा कर देना पर्याप्त नहीं है; आवश्यक है कि बच्चा वास्तव में समझ पाए। सीखने की यह सतत प्रक्रिया जीवन भर चलती रहती है। बच्चा केवल शिक्षक से ही नहीं, बल्कि अपने परिवार, पड़ोस, समाज और साथियों से भी बहुत कुछ सीखता है। उसका व्यक्तित्व इन्हीं सभी अनुभवों से मिलकर बनता है। इसलिए शिक्षा को केवल विद्यालय की जिम्मेदारी मानना उचित नहीं है। यह परिवार, समुदाय और विद्यालय—तीनों की साझी जिम्मेदारी है। यह कहा जा सकता है कि बच्चे का सीखने का विज्ञान सरल होते हुए भी गहरा है। वह अपने आसपास के वातावरण से सीखता है, अनुभवों से समझ विकसित करता है और सकारात्मक सहयोग से अपने कौशल को निखारता है। यदि बचपन में उसे भाषा और संख्यात्मक ज्ञान के साथ-साथ भावनात्मक और सामाजिक विकास के अवसर मिलें, तो वह जीवन में सफल और आत्मविश्वासी बन सकता है। शिक्षा का वास्तविक समाधान इसी समग्र दृष्टि में है, जहाँ समुदाय, परिवार और स्कूल मिलकर बच्चे के सीखने की यात्रा को सशक्त बनाते हैं।

लेखक
श्याम कुमार कोलारे
सामाजिक कार्यकर्ता, स्वतंत्र लेखक
छिन्दवाड़ा, मध्यप्रदेश- 9893573770

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