मुझे पता है माँ! तेरी प्यार भरी वो थपकी
जब मैं बचपन में अकारण रोया करता था।
मुझे याद है माँ! तेरी प्यार भरी झपकी
जब में कभी तुम्हे वेबजह परेशान करता था।
माँ मुझे आज भी तेरा प्यार का अहसास है
जब तू प्यार से मुझे सीने से लगती थी।
सच मे माँ! मुझे वास्तविक सुकून तब आता था
जब तू मुझे आँचल में लिए तेरा दूध पिलाती थी।
तेरे पास माँ! मुझे दुनियाँ का डर न सताता था
तेरी प्यार की झपकी से डर डरकर भाग जाता था।
माँ! मैंने गलतियों पर तुझसे कई बार डाँट खाई है
हाँ माँ! हर बार तेरी डाँट ने कुछ नया हुनर सिखाई है।
पता नही माँ! तेरे चरणों मे जितना में झुकता हूँ
तेरे आशीर्वाद से मै उतना ही ऊपर जाता हूँ।
माँ तेरी कृपा ऐसी है कि चरणों मे जन्नत दिखता है
माँ तेरी कृपा से माथे पर जीत का टीका लगता है।
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लेखक श्याम कुमार कोलारे
छिन्दवाड़ा, मध्यप्रदेश
मोबाइल 9893573770
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कविता
