होली : रंगों का त्यौहार, यह भाईचारा एकता एवं सौहार्द का पर्व
फाल्गुन मास की शुरूआत और बसंत का आगमन, ये ऐसा मौसम है जब सर्दी के अंत और बसंत के आगमन के बाद होली की तैयारी शुरू हो जाती है। होली की शुरुआत की जानकारी प्रकृति अपने आप ही देने लगती है। प्रकृति अपने नए रंगों से सजती है, खेतों में सरसों पीली चादर ओढ़ लेती है, आम के पेड़ों पर बौर आ जाते हैं और वातावरण में एक मधुर सुगंध फैल जाती है, वैसे ही मानव जीवन में भी उल्लास और नई ऊर्जा का संचार होने लगता है। होली का महत्व केवल प्राकृतिक परिवर्तन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका गहरा धार्मिक और नैतिक आधार भी है। इस पर्व से जुड़ी और की कथा हमें यह सिखाती है कि सच्ची भक्ति, सत्य और विश्वास की सदैव विजय होती है। जब होलिका दहन की अग्नि प्रज्वलित होती है, तो वह केवल लकड़ियों को नहीं जलाती, बल्कि हमारे भीतर छिपे अहंकार, क्रोध, ईर्ष्या और द्वेष जैसी बुराइयों को समाप्त करने का प्रतीक बनती है। यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना प्राचीन काल में था। होली का सबसे बड़ा महत्व इसकी सामाजिक भावना में निहित है। यह ऐसा पर्व है जो समाज के विभिन्न वर्गों को एक सूत्र में पिरो देता है। इस दिन न कोई ऊँच-नीच का भेद रहता है, न जाति-पांति का अंतर और न ही अमीरी-गरीबी की दूरी। सभी लोग एक-दूसरे को रंग लगाकर गले मिलते हैं और प्रेमपूर्वक शुभकामनाएँ देते हैं। रंगों का यह मिलन मानो समाज के विविध स्वरूपों के एकीकरण का प्रतीक बन जाता है।
ग्रामीण परिवेश में होली की झलक विशेष रूप से मन को छू लेने वाली होती है। गाँवों में होली की तैयारी कई दिन पहले से शुरू हो जाती है। बच्चे लकड़ियाँ और उपले इकट्ठा करते हैं, महिलाएँ घरों की सफाई और पकवान बनाने में जुट जाती हैं। चौपाल पर बैठकर बुजुर्ग होली के गीतों की तैयारी करते हैं। फाग के स्वर जब ढोलक की थाप पर गूंजते हैं, तो वातावरण में अद्भुत उत्साह भर जाता है। खेतों की मेड़ों पर किसान एक-दूसरे को रंग लगाकर नई फसल की खुशी साझा करते हैं। यह दृश्य केवल उत्सव नहीं, बल्कि सामूहिक जीवन की सुंदरता का प्रतीक होता है।
होली सौहार्द और क्षमा का भी पर्व है। जीवन की भागदौड़ में या आपसी मतभेदों के कारण कई बार संबंधों में दूरियाँ आ जाती हैं। होली ऐसा अवसर देती है जब लोग पुराने गिले-शिकवे भुलाकर एक-दूसरे के गले लगते हैं। “बुरा न मानो, होली है” का भाव केवल हास्य तक सीमित नहीं, बल्कि मन के द्वार खोलने का संदेश देता है। यदि समाज में यह भावना स्थायी रूप से विकसित हो जाए, तो कई सामाजिक समस्याएँ स्वतः समाप्त हो सकती हैं। होली का सांस्कृतिक महत्व भी अत्यंत व्यापक है। इस अवसर पर लोकगीतों, नृत्यों और पारंपरिक व्यंजनों की विशेष धूम रहती है। विशेष रूप से और की लीलाओं से जुड़ी फाग और होली गीत भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर हैं। इन गीतों में प्रेम, भक्ति और आनंद की झलक मिलती है। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएँ समूह बनाकर गीत गाती हैं, बच्चे रंगों से खेलते हैं और बुजुर्ग आशीर्वाद देते हैं। यह सब मिलकर होली को एक जीवंत और समावेशी उत्सव बना देता है। आज के आधुनिक समय में भी होली की भावना प्रासंगिक है। यद्यपि तकनीक और शहरी जीवनशैली ने उत्सव मनाने के तरीकों में कुछ परिवर्तन किए हैं, फिर भी इसका मूल संदेश आज भी वही है—प्रेम और एकता। आवश्यकता इस बात की है कि हम होली को केवल रंगों और दिखावे तक सीमित न रखें, बल्कि इसके मूल्यों को अपने जीवन में उतारें। यदि हम इस दिन सच्चे मन से किसी से क्षमा माँग लें या किसी की भूल को क्षमा कर दें, तो यही होली का सच्चा उत्सव होगा।
पर्यावरण और समाज के प्रति जिम्मेदारी भी इस पर्व का महत्वपूर्ण पक्ष है। प्राकृतिक रंगों का प्रयोग, जल की बचत और मर्यादित व्यवहार हमें यह सिखाते हैं कि उत्सव आनंद के साथ-साथ संवेदनशीलता का भी प्रतीक होना चाहिए। होली तभी सार्थक है जब इसमें किसी की भावना आहत न हो और सभी के चेहरे पर सच्ची मुस्कान हो। होली केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि जीवन को सकारात्मक दृष्टि से देखने की प्रेरणा है। यह हमें सिखाती है कि जैसे विभिन्न रंग मिलकर सुंदर चित्र बनाते हैं, वैसे ही विविधताओं से भरा समाज प्रेम और सौहार्द से ही सशक्त बन सकता है। यदि हम होली के संदेश को अपने दैनिक जीवन में अपनाएँ, तो हमारा समाज अधिक समरस, शांतिपूर्ण और आनंदमय बन सकता है। हम अपने हृदय को प्रेम के रंग से भरेंगे, मनमुटाव को त्यागेंगे और एक-दूसरे के साथ सौहार्दपूर्ण व्यवहार करेंगे, तभी होली का वास्तविक महत्व उजागर होगा और यह पर्व सच्चे अर्थों में एकता और मानवता का उत्सव बन पाएगा। पहले होली का अर्थ था—घर-घर जाकर रंग लगाना, गले मिलना और साथ बैठकर पकवान खाना। गाँवों में चौपाल पर फाग गाए जाते थे, ढोलक की थाप पर नाच-गान होता था। अब शहरी जीवन की व्यस्तता और तकनीकी विकास के कारण लोग व्यक्तिगत मुलाकातों की जगह मोबाइल और सोशल मीडिया पर संदेश भेजकर ही औपचारिकता पूरी कर लेते हैं। WhatsApp और Facebook जैसे माध्यमों ने शुभकामनाएँ देना आसान बना दिया है, परंतु प्रत्यक्ष मिलन की आत्मीयता कुछ कम हो गई है। यह परिवर्तन सुविधा तो देता है, लेकिन पारंपरिक अपनापन धीरे-धीरे घटता प्रतीत होता है।
पहले होली में टेसू के फूलों से रंग बनाया जाता था। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएँ घर पर ही प्राकृतिक गुलाल तैयार करती थीं। इससे न तो त्वचा को नुकसान होता था और न ही पर्यावरण को। आज बाजार में उपलब्ध रासायनिक रंगों ने होली को चमकदार तो बना दिया है, परंतु इनके दुष्प्रभाव भी सामने आए हैं। त्वचा एलर्जी, आँखों में जलन और पर्यावरण प्रदूषण जैसी समस्याएँ बढ़ी हैं। हालांकि अब फिर से प्राकृतिक और ऑर्गेनिक रंगों की ओर लौटने की जागरूकता बढ़ रही है, जो एक सकारात्मक परिवर्तन है।समय के साथ कुछ नकारात्मक प्रवृत्तियाँ भी सामने आई हैं। कई बार होली के नाम पर जबरदस्ती रंग लगाना, असंवेदनशील व्यवहार या नशे का सेवन जैसी समस्याएँ देखने को मिलती हैं। पहले गाँवों में सामाजिक नियंत्रण अधिक था, जिससे अनुशासन बना रहता था। आज के परिवेश में जागरूकता और जिम्मेदारी की आवश्यकता अधिक है। महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक मर्यादा का पालन करना हर नागरिक का कर्तव्य है।आज शहरों में होली कई बार निजी पार्टियों तक सीमित हो गई है। बड़े-बड़े क्लबों और होटलों में रंगारंग कार्यक्रम आयोजित होते हैं। संगीत की तेज धुनों और डीजे की संस्कृति ने पारंपरिक फाग गीतों को पीछे छोड़ दिया है। हालांकि मनोरंजन के नए साधन आकर्षक हैं, परंतु लोक परंपराओं का संरक्षण भी उतना ही आवश्यक है।
लेखक
श्याम कुमार कोलारे
छिन्दवाड़ा, मध्यप्रदेश
9893573770

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