प्रेम और त्याग का झरना “माँ”

                 


जिसके लिए सारा अपना जीवन दीया बार  

मेरा कद बड़ा करने को जीवन किया पार,

मेरे ख़ुशी के खातिर, अपने अरमान दबाये

भर पेट मुझे खिलाकर, खुद वो कम खाये l 

 

सूखा में सुलाकर मुझे, खुद गीले पर सोये

मेरे सपने सजोने को, अपने सपने खोये

मुझे मीठी नींद सुलाने ,खुद रातभर जागे

खुश करने मुझे सदा, हरदम आये आगे l

 

खुद न पढ़ी मगर, मेरी पढ़ाई न होने दी कम

हर कुछ किया जिससे, जीवन में न रहे गम

नयनो से पल भर भी, न होने दिया ओझल

मेरी नित्य नई शरारत, कभी न हुई बेझल l

 

अपनी मेहनत से बनवा दिया बड़ा अफसर

दौलत सोहरत के लिए, दिला दिया अवसर

पीछे मुड़कर भी देखो! किसने क्या खोया

उनके खोने से आज, हमने है क्या पाया l

 

कवी/लेखक

श्याम कुमार कोलारे 

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ