जिसके लिए सारा अपना जीवन दीया बार
मेरा कद बड़ा करने को जीवन किया पार,
मेरे ख़ुशी के खातिर, अपने अरमान दबाये
भर पेट मुझे खिलाकर, खुद वो कम खाये l
सूखा में सुलाकर मुझे, खुद गीले पर सोये
मेरे सपने सजोने को, अपने सपने खोये
मुझे मीठी नींद सुलाने ,खुद रातभर जागे
खुश करने मुझे सदा, हरदम आये आगे l
खुद न पढ़ी मगर, मेरी पढ़ाई न होने दी कम
हर कुछ किया जिससे, जीवन में न रहे गम
नयनो से पल भर भी, न होने दिया ओझल
मेरी नित्य नई शरारत, कभी न हुई बेझल l
अपनी मेहनत से बनवा दिया बड़ा अफसर
दौलत सोहरत के लिए, दिला दिया अवसर
पीछे मुड़कर भी देखो! किसने क्या खोया
उनके खोने से आज, हमने है क्या पाया l
कवी/लेखक
श्याम कुमार कोलारे

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